Tuesday, 15 July 2014


माँ तुम दिल बनकर
 आज भी सीने में धड़कती हो
 ठोकर लगने पर
 पलकों से आज भी तुम
 बरसती हो !

 मेरी हर पीडा तुम ही 
समझती हो 
अपनी ममता कि खुशबु से
 हर दर्द मेरा हरती हो !

माँ तुम नब्ज़ बनकर
 मेरी रगो में बहती हो 
 ख़ुदा के घर में भी
 मेरे बगैर माँ उदास
 तुम बहुत रहती हो !

 तमाम रिस्ते से बेहतर
 तुम प्यार मुझे करती हो
 माँ तुम दिल बनकर
 आज भी मेरे
 सीने में धडकती हो !

विजय गिरी
 
देख फितरत उसकी में
 हैरान था
ज़ख़्म दिए जिन हाथो ने
मलहम लिए हाथो में
नजरे झुकाये खड़ा वो पुराना
मेरा यार था !

विजय गिरी



***कशक ज़िंदगी की अधूरी है***
***मेरी ज़िंदगी और मौत के बीच***
***बस थोड़ी सी दुरी है*** !!

***ऐ खुदा दे थोड़ी सी मोहलत मुझे***
*** किसी ज़िंदगी के लिए***
***मेरा होना अभी बहुत जरुरी है*** !!

VIJAY GIRI

तुम्हारी कमी है
मेरी पलकों में नमी है !!
ओ दिल ठुकराने वाले
देख मेरी ये सांसे सिर्फ
तुम्हारे इंतजार में थमी है !!

विजय गिरी
 
*******माँ******

ऐहसास तेरा हर पल दिल में खलता है
ऐ माँ याद कर प्यार तेरा
मेरी पलकों से अब दर्द छलकता है !!

बहुत दौलत-शोहरत पाया मेने
रातें अब करवट बदल-बदल गुजरता है
ऐ माँ तेरे आँचल का वो साया अब खलता है !!

संजोता रहा कागज के चंद टुकड़ो को
भूख ना मिटा पल-भर के लिए
अब ये दिल तड़पता है
ऐ माँ तेरे हाथो का अब वो
निवाला खलता है !!

इस भीड़ भड़ी दुनियाँ में
अब अकेला पन लगता है
ख़ुदा के घर आ कर तेरी
गोदी में सर रखकर सोने को दिल करता है

ऐ माँ याद कर प्यार तेरा
अब मेरी पलकों से दर्द छलकता है !!

विजय गिरी

 

ज़िन्दगी जीने का हर
हुनर हमने सिख लिया है !!

दिल हार कर
दिल जितना सिख लिया है !!

अब मौत भी आजाये तो
गम नहीं दोस्तों !!

उस बेवफा से ज़िंदगी
जितने का हुनर भी
हमने सिख लिया है !!

विजय गिरी

 
ना दुःखा दिल तू किसी का
हर दिल में खुदा बसता है !!

टूटता है दिल किसी का
तो वो खुदा रूठता है !!

तोड़ दिल मुस्कुराते है
वो लोग
मिटटी का जो खुदा
बेचता है !!

विजय गिरी