Friday, 19 July 2013

                                                                              

  !! यादो के सहारे!!

उसकी यादो के सहारे ही 
जिए जा रहा हु मै !

बिता हुआ हर वो लम्हा
 कोरे कागज पर ही 
लिखता जा रहा हु मै !

दफ़न कर हर राज " विजय " 
अपने सीने में
एक कश्म-काश की 
जिंदगी जिए जा रहा हु मै !
विजय गिरी


!!अब ऐसा कोई साथी नहीं मिलता !!

अब तो हर गली-गली में 
प्यार का खिलौना बिकता है !
जिसके दिल में हो सच्ची मोहब्त 
वो ही दिन-रात रोता है !
कोई थाम ले किसी के
 बहते हुए अस्को को !
भला एसा साथी 
अब कहा कोई मिलता है ?

विजय गिरी 


!! मेरी बेबसी !! 

 मेरे फैसलों से हैरान रह जाते है सब !


अक्सर गम खरीद कर प्यार निभाता हू !
इसलिए शायद "विजय"को ठुकराते है सब !

करते है लोग "विजय"से बेवफाई
और मेरे बहते हुए अश्को से अपने
दिल की प्यास बुझाते है सब !

छोड़ देते है अक्सर लोग सुन-सान
राहों में "विजय" का साथ !

और दूर से ही "विजय" की बेबसी पर
मुस्कुराते है सब !
VIJAY GIRI

                                                               

  !!  टूटे बंधन !!

अरे कोई तो सम्भाल लो मुझे !
मै वो दुनिया छोड़ कर आया हु !
वो सारे बंधन तोड़ कर आया हु !


अब ना जाऊंगा कभी उनकी गलियों में !
अपनी मंजिल पा कर भी कलि हाथ 
आया हु !

अरे कोई तो सम्भाल लो मुझे !!
अब तो मै अपनी जिंदगी से ही हार
कर आया हु !

विजय गिरी




!! मेरी मजार के फुल !!

माना ये सनम तेरे कदमो में
आज भी कुछ दीवानों के फुल 
बिछते है !


पर यकीन मान वो दीवाने  भी 
अपने हाथो में मेरी ही मजार के फुल 
रखते है

विजय गिरी 



!! वो ही मेरे पास नहीं !!

खुशिया आज मेरे दामन में है !


पर खुशियों का अब मुझे कोई

अहसास नहीं !

शायद इस दिल में अब वो जस्बाद
कोई खवाब खास नहीं !

तलाशता था जिनके लिए में खुशिया
अब तो वो ही मेरे पास नहीं !

विजय गिरी 

Wednesday, 26 June 2013


!! प्राक्रतिक संदेह !!

खो रही नमी ये भूमि 
सूरज की तपीश अभी बाकी है !
सिमट रही ये नदिया ,अब तो वारीश 
की भी कमी खलने वाली है !

संभल जाये हम मानव 
ये वृछ ही जिंदगी हमारी  है !
मत  करो खिलवाड़ इस प्राक्रतिक से 
जाने कैसी -कैसी विपदा आने वाली है !

आगाह  कर रही ये प्राक्रतिक हमें 
कही सुखा तो कही पनी-पानी है !
 खो रही प्रक्रति अपना संतुलन 
कही भूकंप तो कही तबाही है !

अब तो संभल जाये हम 
इसी वृछ इसी नदियों से प्रक्रति 
और प्रक्रति से ही जिंदगी हमारी है !

विजय गिरी