Monday, 13 May 2013
बलात्कार-अत्याचार क्यों ?
ये इन्सान क्यों हैवान होता जा रहा है
ये मानवता--इन्सानियत का रिश्ता
क्यों तार-तार होता जा रहा है !
ये माशूम सी बच्चीयो पर क्यों परहार
अत्याचार-बलात्कार का
होता जा रहा है !
जिस माशूम का नहीं होता कोई दोष !
क्यों उनके दिलो पर ता-उम्र के लिए
ज़ख्मो का निशान होता जा रहा है !
ये भारत देश तो है !
राम-रहीम -मीरा-राधा के संस्कारो वाला !
अपनी रीती-रिवाजो से जाना-पहचाना !
फिर क्यों इंसानों में जानवरों सा
संस्कार होता जा रहा है !
ये इन्सान क्यों हैवान होता जा रहा है
ये मानवता--इन्सानियत का रिश्ता
क्यों तार-तार होता जा रहा है !
ये माशूम सी बच्चीयो पर क्यों परहार
अत्याचार-बलात्कार का
होता जा रहा है !
जिस माशूम का नहीं होता कोई दोष !
क्यों उनके दिलो पर ता-उम्र के लिए
ज़ख्मो का निशान होता जा रहा है !
ये भारत देश तो है !
राम-रहीम -मीरा-राधा के संस्कारो वाला !
अपनी रीती-रिवाजो से जाना-पहचाना !
फिर क्यों इंसानों में जानवरों सा
संस्कार होता जा रहा है !
VIJAY GIRI
हे नारी
चंडी का रूप ले अब तू
अत्याचारियों का संघार कर
हाथो में ले कर खड़क
पापियों के लहू से अपना
सिंगार कर !
नहीं आयेगे अब कोई केशव तेरे
ना किसी अपने लाल पर एतबार कर
थाम लो अब अपने हाथो में खड़क
इस कलयुग के रकछशो का विनाश कर !
समझते है जो नारी की ममता को लाचारी
शीतल-निर्मल हिरदय वाली कन्या को कायरता
की निशानी !
ऐसे पापिओ -बलात्कारियो पर
अपनी शक्ति का परहार कर !
हे नारी
चंडी-काली का रूप ले अब तू
अत्याचारियों-बल्त्कारियो के
लहू से अपना सिंगार कर !
चंडी का रूप ले अब तू
अत्याचारियों का संघार कर
हाथो में ले कर खड़क
पापियों के लहू से अपना
सिंगार कर !
नहीं आयेगे अब कोई केशव तेरे
ना किसी अपने लाल पर एतबार कर
थाम लो अब अपने हाथो में खड़क
इस कलयुग के रकछशो का विनाश कर !
समझते है जो नारी की ममता को लाचारी
शीतल-निर्मल हिरदय वाली कन्या को कायरता
की निशानी !
ऐसे पापिओ -बलात्कारियो पर
अपनी शक्ति का परहार कर !
हे नारी
चंडी-काली का रूप ले अब तू
अत्याचारियों-बल्त्कारियो के
लहू से अपना सिंगार कर !
VIJAY GIRI
मै अब तक था एक कोरे कागज की तरह !
जो तुमने एक नज़र देखा तो मुझे
शायर बना दिया !
मै जो डूबा एक बार तेरी झील सी आखो में !
जो मै डरता था किनारों से, अब तैरना
सीखा दिया !
ये तो है एक तेरी सासों की महक !
जो इस सुने से दिल में !
तुमने शोला जगा दिया !
अरे मै तो सोया था चैन से अपनी मजार पर !
तूमने दो फुल चढ़ा के मुझको जगा दिया !
तेरी चाहत ने मुझे जीना सीखा दिया !
विजय गिरी
Saturday, 7 July 2012
मेरे ज़ख्मो पे बजती है तालियाँ
खुशियों में कविता और गम शायरी लिखते हैं
खुदा रखे उन्हें सलामत जिस पे हम मरते हैं
महफ़िलो में जब हम दर्द ऐ दिल बया करते हैं
दोस्तों एक आह सी निकल जाती हैं
जब लोग वाह वाह करते हैं
कोरे कागज़ पे जब हम हाल-ऐ-दिल लिखते है
लोग उसे भी एक ग़ज़ल कहते हैं
पलके छलक जाती है
जब लोग हमसे एक और फरमाइश करते हैं
खुदा रखे उन्हें सलामत जिनकी यादों
में हम दर्द-ऐ-दिल लिखते है
जिसे कोई कविता,तो कोई शायरी कहते हैं...
-Vijay Giri
थामे रखना हाथ
थामे रखना हाथ मेरा
वरना आज़ाद पंछी की तरह
मै उड़ जाऊंगा
यादो में तेरी एक
मीठा सा दर्द बनके बस जाऊंगा !
छोड़ना न कभी साथ मेरा
वरना मैं तो मर जाऊंगा
देना तुम भी साथ मेरा,
वादा है तुमसे ...
गुलाब की पंखुड़ी बन के
तेरे लिए बिखर जाऊंगा !
मेरी वफ़ा मेरी चाहत को कभी
यु ही नज़रंदाज़ न करना !
वरना मैं तो टूट जाऊंगा !
थामे रखना तुम भी साथ मेरा
मैं तो मर कर भी
तेरा दमन खुशियों से भर जाऊंगा
- Vijay Giri
Subscribe to:
Posts (Atom)






