Tuesday, 22 July 2014



  • देखो-देख़ो हमारे नेता जी के हाल
     सर पे टोपी , ऐ.सी है कार
     जनता उठा रही है नेता जी का भार !!

    सफ़ेद कुर्ते पे लगता कला बदनामी का दाग
     नेता जी कहते ,ये है विरोधियो की चाल
      सीबीआई वाले अपना सर खुजाते
     नेता जी अपनी फोटो खिचवाते
     देश की जनता अपनी किस्मत को गाते !!

    देखो-देखो ये नेता जी की हाल 
     बगल में हमेशा इनकी गन की दुकान 
     बाक़ी जनता है रद्दी सामान !!

    जनता की कमाई ये मिलकर खाए
      विकास के नाम पर जाँच करवाये
     ना भरे पेट तो जनता पर लाठिया गिरवाये !!

    सुनो-सुनो नेता जी के मीठे बोल
     मंत्री जी दे-दो मुझे भी एक कुर्सी
     वार्ना खोल दू मैं तुम्हारे सारे पोल !!

    नेता जी एक बार हमारे घर को आते

     हाँथ जोड़ प्यार से अपना सर झुकाते
     चुनाव जीत कुर्सी पाते
     फिर दूर से ही टाटा कर हमें
     अपना ठेंगा दिखाते !!


बदलने लगी  हैं फ़ितरत  लोगों की 
अहसासों  के रिश्ते भी अब 
पिघलने लगे लगे है !!

मुश्किलें हालत में  जो   लोग 
 थाम लेते थे हाथ हमारा !!

 अब  मेरे आशुओ पर भी 
 वहीं लोग मुस्कुराने लगे हैं 

विजय गिरी
    



माँ-बाप कि ममता के छाओं में
 बड़े हुए,बच्चे बीना किसी अभाव में !!

जाने कितनी राते कटी फाको में
 जाने कितने दिन रहे माँ-बाप
 बच्चो के खातिर उपवास में !!

आज उन्ही बूढी आँखों में
 आशु दे रहे बच्चे वो
 जिन आँखों से बहता था आशु
 बच्चो के उत्थान में !!
 
विजय गिरी


यहाँ हर शख्श मुर्दो की बस्ती में
 इन्सान ढूंढ़ता है !!
 जस्बादो की अर्थी के लिए
 किसी का प्यार ढूंढ़ता है !
देख हैवानियत का खेल
 इस दुनियाँ में बहु-बेटी की
 मर्यादा के लिए
 पीता  शैतान ढूंढ़ता है !
 दफ़न कर अपने जमीर
 अपने ईमान को
 हर शख्श दुसरो में
 ईमान ढूंढ़ता है !
यहाँ हर शख़्श मुर्दो की बस्ती में
 इन्सान ढूंढ़ता है !

विजय गिरी 

Friday, 18 July 2014

 
काश तुम अपना दिल हार जाती
मैं ज़िन्दगी हार जाता !!

भूल कर ये सारा जहाँ
पल-भर के लिए तेरे
दिल में समां जाता !!

तुम थोड़ा साथ देती मेरा
मैं गुलाब की पंखुड़ी बन
तेरे कदमो में बिखर जाता !!

विजय गिरी

Thursday, 17 July 2014

 

मेरे सीने में बड़ी पीड़ा होती है
जब कोख में कोई नन्ही परी
दफ़न होती है !!

मेरे दिल में एक कशक सी होती है
जब दहेज़ के नाम पर
कोई जननी दफ़न होती होती है !!

मेरी कलम स्याही नहीं
पीड़ा के अश्क उगलती है
ज़ख्मो पर मलहम बनने वाली
 नारी जब प्यार लिखते-लिखते भी
दफ़न होती है !!

विजय गिरी

मैं नये पथ पर चलने वाला
 मुशाफिर थोडा पुराना हु !!

 सवार हुआ जब से मैं 
 मोहबत ऐ ज़माने कि 
कस्ती में यारो !!

कशम उस खुदा कि
 हर लहर ऐ कातिल नज़रो का
 सीर्फ मै ही निशाना हु !!

 विजय गिरी