Sunday, 11 September 2011

हे नारी तुम्हे मेरा प्रणाम




सुकून मीलता है उस मैली आचल में जहा 
      सारा प्यार उभर आता है !
 अपने एक-एक बूंद से जो सीचती हमें वो 
      आचल माँ का कहलाता है !


 सर पे रहता बहना का हाथ  तो दुआ 
         खुद लग जाती है !
 देख सावन में बहन के हाथो की मेहँदी 
       मौत भी डर जाती है  !

 छल-कपट ना कोई सवार्थ हर दुःख में
 दे जो साथ वो ममता की मूरत तू नारी
          ही कहलाती है  !

हे जननी-हे नारी किस भाषा में करू 
     वयाख्यान मै तुम्हारी  ?
   शब्द कम पड़ जाते है !
  नत-मस्तक ये शीस मेरे हो जाते है  !

         विजय गिरी


Saturday, 10 September 2011

एक गुजारीश

  

मेरी तमन्नाओ  का तुम  भी  ख्याल रखना  !
  दील में अपने थोडा  सा  जस्बाद  रखना    !
  बिछड़  ना  जाय  हम  भी  कही   इस   भीड़  में
  मेरे हाथो में सदा तुम अपना हाथ रखना    !

   मेरी मंजिल हो  तुम्ही  मेरी जिंदगी हो तुम्ही
          यही है  बस  मेरी  आरजू  !
  मेरी  दुआओ  में तुम भी अपनी  दुआ  
         थोड़ा  साथ  रखना   !

 अक्सर  लोग  चेहरे  बदल  लेते  है   !
 हो  कोई  खता  तो  साथ छोड़  देते  है  !
टूट ना जाय  कही ये  दील  तुम अपनी 
पलकों  की थोड़ी  सी  छाव  रखना   !

 बड़ा  मासूम  है ये नन्हा  सा दील  
 चुरा  ना ले  मुझको  भी कोई तुम से   !
 इसलिए  मेरा  ये दील भी तुम अपन
ही   पास  रखना    !

 विजय गिरी 

Thursday, 8 September 2011

प्रेम की चिंगारी





पत्थर पे जो खीला दे फुल मोहब्त उसको 
कहते है !
वर्ना चाँद-सीतारो को तोड़ कर लाने की
बाते तो अक्सर सब कहते है !

 मै ये नहीं कहता की पत्थर दिल नहीं
 पीघलता वर्ना कोई झरना यु पहारो से 
 नहीं नीकलता !

 प्यार तो है उस ईश्वर का दूसरा नाम यारो 
 वर्ना श्याम के लीए उस गोरी मीरा  को
 यु वीष ना पीना पड़ता !

  दरिया में जो लगा दे आग मोहब्त
  उसको कहते है !
  यु तो छोटी सी चिंगारी भी अक्सर
  जाने कितने घर जला देते है !

  जीसके दील में हो  सच्चा प्यार वो
  खुद कुर्बान हो जाते है !
  किसी का दील जीतना क्या यारो
 वो तो पत्थर दील को भी रुला देते
      है ! 
               
 विजय गिरी








Sunday, 4 September 2011

छलकती आख़े

  



ये तेरी छलकती आख़े मेरी चाहत की निशानी है !
  कभी था मै तेरा आज तू मेरी दीवानी है !
  अरे ये दिल तो मचलता था सिर्फ तेरी ही एक 
            झलक पाने को !

  फिर क्यु तेरी आखो में आज पानी है !
  माना की वो गुजरा हुआ वक्त तुम्हारा था !
  और नशे में झूमता हर शख्स तुम्हारा था !
  पर उस भीड़ में शामिल नहीं ये दीवाना था !
  मेरी मोहब्त की दस्ता तो वो हवा सुनती है !
  जो अक्सर इस खारे समुन्द्र को छू के जाती है !
  अब ना कोई चाहत-ना मंजिल पाना है !
  सज रहा है वो बिस्तर और आखरी सफ़र 
           पे जाना है !

  ना समझा तुने तो कभी मेरी मोहब्त को
  फिर क्यु तेरी आखों में आज पानी है !
 अरे कभी था मै तेरा आज तू दीवानी है !
 और ये तेरी छलकती आख़े तो मेरी चाहत
की निशानी है !

 विजय गिरी


Saturday, 3 September 2011

सुनी नजरे



 इन पलकों से अब कोई अश्क छलकता ही नहीं !
 जाने क्यों  इस दिल में अब कोई दर्द उठता ही नहीं !
  जाने क्या हो गया मुझे यारो इस दिल  में अब कोई
   ख्वाब पलता ही नहीं !
   बहुत देखे इस दिल ने ख्वाबो को पर रेत का कोई
   महल टिकता ही नहीं !
   जी रहा था मै ख्वाबो की दुनिया में पर बंद मुट्ठी 
     में भी रेत रुकता ही नहीं !
    देखा जब मेने दुनिया को उसी की नजरो से
    तो पता चला कोई दर्द को समझता ही नही  !
  बीच भवर में जो थाम ले कोई कस्ती ऐसा  शख्स 
      अब कोई मिलता ही नहीं !
   देखे है मेने उजरते हुए बागो को इसलिए 
     इस दिल में अब कोई ख्वाब पलता ही नहीं
    रोई है इतनी ये मेरी आखे की अब
   कोई आंसू छलकता ही नहीं  !
                  
             विजय गिरी


Friday, 2 September 2011

मेरा खुदा

 



 मेरा खुदा == ना मंदिर ना मस्जिद जाते है !
 हम तो बस तेरा ही गुणगान गाते है  !
 देखते है जब भी तुम्हे मनो चारो- धाम 
 हम तो तुम्ही में पाते है !
 झुकता है सारा संसार उस खुदा के सामने 
 पर उस खुदा का प्यार तो हम तुम्ही
        में पाते है !
 कोई दीप तो कोई मन्नत से उस खुदा को 
    बुलाता है ! 
 पर मेरा खुदा तो मेरी खुशियों के लिए 
 पल-भर में दोड़ा चला आता है !
 मेरे खुदा तो वो इंसान है !
 जीसके लीए मेरी खुशिया मंदिर
  और मेरा दिल अजान सामान है !
  तो क्यों जाऊ मै मंदिर क्यों
  जाऊ मै मस्जिद !
  मेरे लीए तो तू ही खुदा और
  तेरा प्यार ही वो चारो-धाम है !
विजय गिरी


Thursday, 1 September 2011

TAB-AUR-AB

उफ़.... वो भी क्या जमाना था ...!
 वो लाल दुपट्टे वाली लड़की और 
 एक लड़का पागल दीवाना  था !
  रात -रात भर जाग के वो प्रेम -पत्र 
 लीखने का अंदाज  बड़ा ही निराला था !
 जेब में लीये चिट्ठी साइकिल पे
   घुमने वाला वो लड़का आशिक 
    बड़ा ही दीवाना था !
  घर से स्कूल- से-स्कूल तक पीछा 
   करने वाला वो लड़का मनो 
    उस घर का नौकर  बड़ा ही
 पुराना था  !
  और अब :::-- 
   अब तो अपनी ही सब की एक
 प्रेम-कहानी है !
  चेहरे पे बंधा नकाब और हाथो 
   में  इलेक्ट्रोनिक घोड़े की चाभी है !
 मोबाइल में करे ये MSG टाइप लो 
  ये दिल तुम्हारा है !
    ना प्यार का एहसास ना दिल में कोई 
   जस्बाद जहा भी देखी सुन्दर कन्या फिर से
      ये दिल तुम्हारा है !
 वाह रे मेरे ऊपर वाले ये केसा 
  जमाना है.......!



             विजय गिरी