Friday, 16 September 2011

एक नजर जो देखा तुम्हे




एक नजर जो देखा तुम्हारा नुरानी चेहरा !
तो इस दील में तुम्हे बसा लिया !

है सागर से भी गहरी तुम्हारी आख़े जीसने
मुझे घायल बना दीया !

मदहोश है ये मेरा दील तेरे वास्ते तुम्हे 
तो हमने अपना मुकद्दर बना लीया   !

है तेरे ओठ तो वो गुलाबो की पंखुड़ी 
जीसे हमने अपना गजल बना लीया !

क्या खूब है तेरी अदाए क्या खुदा ने तुम्हे 
बना दीया !

नजर ना लगे  इस ज़माने की तुम्हे कही 
हमने तो अपनी पलकों में तुम्हे छुपा लीया !

देखा जो तुम्हे एक नजर तो पहली नजर 
में ही अपना बना लीया !

है तू -ही तो मेरी ज़िन्दगी तुम्हे अपने दील 
की धरकनो में बसा लीया !

            

             विजय गिरी





Sunday, 11 September 2011

हे नारी तुम्हे मेरा प्रणाम




सुकून मीलता है उस मैली आचल में जहा 
      सारा प्यार उभर आता है !
 अपने एक-एक बूंद से जो सीचती हमें वो 
      आचल माँ का कहलाता है !


 सर पे रहता बहना का हाथ  तो दुआ 
         खुद लग जाती है !
 देख सावन में बहन के हाथो की मेहँदी 
       मौत भी डर जाती है  !

 छल-कपट ना कोई सवार्थ हर दुःख में
 दे जो साथ वो ममता की मूरत तू नारी
          ही कहलाती है  !

हे जननी-हे नारी किस भाषा में करू 
     वयाख्यान मै तुम्हारी  ?
   शब्द कम पड़ जाते है !
  नत-मस्तक ये शीस मेरे हो जाते है  !

         विजय गिरी


Saturday, 10 September 2011

एक गुजारीश

  

मेरी तमन्नाओ  का तुम  भी  ख्याल रखना  !
  दील में अपने थोडा  सा  जस्बाद  रखना    !
  बिछड़  ना  जाय  हम  भी  कही   इस   भीड़  में
  मेरे हाथो में सदा तुम अपना हाथ रखना    !

   मेरी मंजिल हो  तुम्ही  मेरी जिंदगी हो तुम्ही
          यही है  बस  मेरी  आरजू  !
  मेरी  दुआओ  में तुम भी अपनी  दुआ  
         थोड़ा  साथ  रखना   !

 अक्सर  लोग  चेहरे  बदल  लेते  है   !
 हो  कोई  खता  तो  साथ छोड़  देते  है  !
टूट ना जाय  कही ये  दील  तुम अपनी 
पलकों  की थोड़ी  सी  छाव  रखना   !

 बड़ा  मासूम  है ये नन्हा  सा दील  
 चुरा  ना ले  मुझको  भी कोई तुम से   !
 इसलिए  मेरा  ये दील भी तुम अपन
ही   पास  रखना    !

 विजय गिरी 

Thursday, 8 September 2011

प्रेम की चिंगारी





पत्थर पे जो खीला दे फुल मोहब्त उसको 
कहते है !
वर्ना चाँद-सीतारो को तोड़ कर लाने की
बाते तो अक्सर सब कहते है !

 मै ये नहीं कहता की पत्थर दिल नहीं
 पीघलता वर्ना कोई झरना यु पहारो से 
 नहीं नीकलता !

 प्यार तो है उस ईश्वर का दूसरा नाम यारो 
 वर्ना श्याम के लीए उस गोरी मीरा  को
 यु वीष ना पीना पड़ता !

  दरिया में जो लगा दे आग मोहब्त
  उसको कहते है !
  यु तो छोटी सी चिंगारी भी अक्सर
  जाने कितने घर जला देते है !

  जीसके दील में हो  सच्चा प्यार वो
  खुद कुर्बान हो जाते है !
  किसी का दील जीतना क्या यारो
 वो तो पत्थर दील को भी रुला देते
      है ! 
               
 विजय गिरी








Sunday, 4 September 2011

छलकती आख़े

  



ये तेरी छलकती आख़े मेरी चाहत की निशानी है !
  कभी था मै तेरा आज तू मेरी दीवानी है !
  अरे ये दिल तो मचलता था सिर्फ तेरी ही एक 
            झलक पाने को !

  फिर क्यु तेरी आखो में आज पानी है !
  माना की वो गुजरा हुआ वक्त तुम्हारा था !
  और नशे में झूमता हर शख्स तुम्हारा था !
  पर उस भीड़ में शामिल नहीं ये दीवाना था !
  मेरी मोहब्त की दस्ता तो वो हवा सुनती है !
  जो अक्सर इस खारे समुन्द्र को छू के जाती है !
  अब ना कोई चाहत-ना मंजिल पाना है !
  सज रहा है वो बिस्तर और आखरी सफ़र 
           पे जाना है !

  ना समझा तुने तो कभी मेरी मोहब्त को
  फिर क्यु तेरी आखों में आज पानी है !
 अरे कभी था मै तेरा आज तू दीवानी है !
 और ये तेरी छलकती आख़े तो मेरी चाहत
की निशानी है !

 विजय गिरी


Saturday, 3 September 2011

सुनी नजरे



 इन पलकों से अब कोई अश्क छलकता ही नहीं !
 जाने क्यों  इस दिल में अब कोई दर्द उठता ही नहीं !
  जाने क्या हो गया मुझे यारो इस दिल  में अब कोई
   ख्वाब पलता ही नहीं !
   बहुत देखे इस दिल ने ख्वाबो को पर रेत का कोई
   महल टिकता ही नहीं !
   जी रहा था मै ख्वाबो की दुनिया में पर बंद मुट्ठी 
     में भी रेत रुकता ही नहीं !
    देखा जब मेने दुनिया को उसी की नजरो से
    तो पता चला कोई दर्द को समझता ही नही  !
  बीच भवर में जो थाम ले कोई कस्ती ऐसा  शख्स 
      अब कोई मिलता ही नहीं !
   देखे है मेने उजरते हुए बागो को इसलिए 
     इस दिल में अब कोई ख्वाब पलता ही नहीं
    रोई है इतनी ये मेरी आखे की अब
   कोई आंसू छलकता ही नहीं  !
                  
             विजय गिरी