Monday, 13 May 2013
Saturday, 7 July 2012
मेरे ज़ख्मो पे बजती है तालियाँ
खुशियों में कविता और गम शायरी लिखते हैं
खुदा रखे उन्हें सलामत जिस पे हम मरते हैं
महफ़िलो में जब हम दर्द ऐ दिल बया करते हैं
दोस्तों एक आह सी निकल जाती हैं
जब लोग वाह वाह करते हैं
कोरे कागज़ पे जब हम हाल-ऐ-दिल लिखते है
लोग उसे भी एक ग़ज़ल कहते हैं
पलके छलक जाती है
जब लोग हमसे एक और फरमाइश करते हैं
खुदा रखे उन्हें सलामत जिनकी यादों
में हम दर्द-ऐ-दिल लिखते है
जिसे कोई कविता,तो कोई शायरी कहते हैं...
-Vijay Giri
थामे रखना हाथ
थामे रखना हाथ मेरा
वरना आज़ाद पंछी की तरह
मै उड़ जाऊंगा
यादो में तेरी एक
मीठा सा दर्द बनके बस जाऊंगा !
छोड़ना न कभी साथ मेरा
वरना मैं तो मर जाऊंगा
देना तुम भी साथ मेरा,
वादा है तुमसे ...
गुलाब की पंखुड़ी बन के
तेरे लिए बिखर जाऊंगा !
मेरी वफ़ा मेरी चाहत को कभी
यु ही नज़रंदाज़ न करना !
वरना मैं तो टूट जाऊंगा !
थामे रखना तुम भी साथ मेरा
मैं तो मर कर भी
तेरा दमन खुशियों से भर जाऊंगा
- Vijay Giri
Wednesday, 21 March 2012
तुम-बिन
तुम-बिन
<=====>
कोई ख़ुशी अब कोई गम नहीं है !
तुमसे जुदाई का अब कोई इस
दिल में ज़ख़्म नहीं है !
सारे कश्मे-वादे टूट गए !
अब इस दिल में भी कोई
उमंग नहीं है !
हमने पनाह ले-ली अब गहरी
नींद की आगोश में !
बेवफा हो तुम किसी दिल के
कातिल हम नहीं है !
कितनी सिद्दत से चाहा तुम्हे !
तुम-बिन हम केसे रह पाते
ऐ- मेरी जिंदगी !
तुमसे जुदा हो कर अब ज़िन्दा
हम नहीं है !
विजय गिरी
Sunday, 4 March 2012
मेरी दीवानगी
मेरी दीवानगी
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कतरा -कतरा बहते मेरे अस्क
और मै बड़ा मशहूर हो गया !
बड़ी अजीब सी है मेरी दीवानगी
मै खुद से दूर हो गया !
पल-पल छलकती मेरी आखे
हर सपना अस्को में खो गया
मै अब तक भटक रहा उसकी
ही चाहत में मै दीवाना मशहूर
हो गया !
जब से मिल कर बिछड़े वो हम से
मेरे लबो को गुन-गुनाना आ गया
अरे थोडा मशहूर क्या हुए हम
की एस ज़माने को दिल जलना
आ गया !
कतरा -कतरा बहते मेरे अस्क
और मै बड़ा मशहूर हो गया !
बड़ी अजीब सी है मेरी दीवानगी
मै खुद से दूर हो गया !
विजय गिरी
Saturday, 3 March 2012
कशक
कसक
<= = = = = = = =>
इस दिल में एक कशक सी रहती है !
जीन पलकों ने संजोये थे सपने
वो पलके भी अब रोते-रोते
सोती है !
ना जाने लगी ये किसकी नज़र
जो खिले हुए बागो में भी
वो फूलो पे उदासी सी रहती है !
हरा-भरा है घर आँगन मेरा
हर कोने से किलकारी गूंजती है !
पर जाने क्यों हर-पल मुझे एक
कमी सी इस दिल में खलती है !
हर सुबह की किरणों में मुझे
एक उम्मीद की रौशनी आती है !
पर ढलती हुई शामो में ये सासे
थम सी जाती है !
रस्ता देख रही ये सुनी नज़रे
ये पलके भी छलक-छलक
सी जाती है !
बिता हुआ हर वो लम्हा यादो
में एक कसक सी दे जाती है !
विजय गिरी
Saturday, 25 February 2012
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